चाह – विजया देशपांडे 0 ▲ Ratika Deshpande 1 hour ago · Science · hide · 0 comments जीने की अब चाह नहीं पर मरना अपने हाथ नहीं | बचपन पल में बीत गया जवानी यूं ही चली गयीबुढ़ापे ने कब घेर लिया इसका पता चली ही नहीं | जीने की अब चाह नहीं पर मरना अपने हाथ नहीं | जीवन में कुछ करना चाहाकुछ भी हम कर सके नहीं |पशुवत जीना जीया हमने इस विषाद से नींद नहीं | जीने की अब चाह नहीं पर मरना अपने हाथ नहीं | माता – पिता को खूब सतायापितृ ऋण हम चूका सके नहीं |पछतावे की आग में जल रहे पर इसका कोई इलाज नहीं | जीने की अब चाह नहीं पर मरना अपने हाथ नहीं | जन्म – मरण के काल – चक्र में क्या खोया क्या पाया हमने इसका कोई हिसाब नहीं | जीने की अब चाह नहीं पर मरना अपने हाथ नहीं | निराश क्यों होता है बन्देप्रभु इतना निष्ठुर नहीं |उसके घर में देर सही हैपर अंधेर तो नहीं | मन की आँखें खोल जरा तूप्रभु अंदर मिल जाएगा जिसने तुझे जनम दिया है वही भवसागर पार लगाएगा | No comments yet. Log in to reply on the Fediverse. Comments will appear here.