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कुछ दिन पहले, मेरे दोस्त अर्जुन ने कुछ कविताएं मुझे भेजीं, जो उनकी माँ ने लिखी थी । मैंने प्रियंवदा जी के बारे में अपने दोस्त से बहुत कुछ सुना था और जब उनकी कविताएं मैंने पढ़ी तो उनसे मिलने की मेरी इच्छा और बढ़ गयी। ये मौका कब मिलेगा पता नहीं। पर मैं यहाँ उनकी कुछ कविताएं पोस्ट कर रही हूँ क्योंकि वह इतनी सुन्दर हैं कि मैं चाहती हूँ कि जो लोग उन्हें नहीं जानते उन्हें भी प्रियंवदा जी के शब्द पढ़ने का मौका मिले। फेमिनिज्म़ कहीं रंग ,कहीं कीचड़कहीं आग़ाज़ के आसपासतो कहीं अंजाम से कोसों दूरफिज़िक्स की भाषा में कहें तो सान्युसाइडल वेव..लकीर से ऊपर यालकीर से नीचेपर लगातार चलती हुई साड़ीयों में लिपटी संस्कारी ,सामाजिक नेत्रीदेश की एक तिहाई की रहनुमा बनीं संसद में डंके की चोट पर अपनी बात कहने वालीया कुर्सी पर चिपक करनेता की जी हुजूरी करने वाली..फेमिनिज़्म का हिस्सा हैं। घर की रसोई में खड़ीअपनी कॉलेज जाती लड़की के लिए सपनों के डिब्बे भरतीअपने ही घर वालों के विरुद्ध खड़ी औरत भी फेमिनिज़्म है। अगर पीठ पर बच्चा बांधेतीर लेकर जंगल में खड़ीसमाज के ठेकेदारों सेअपने घर को बचाती नक्सली भी फेमिनिज़्म है,तो…

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